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भारत-चीन विवाद – An Article by Nikhil Singh

सौ करोड़ से अधिक लोगों को गोद में लिए, मस्तक पर धवल किरीट धारण किए हुए, सागर में पांव पसारे हुए, सोन चिरैया सा लहराता हुआ हिमालय की गोद में लिटा हुआ हमारा ये अखंड भारत। सदियों का इतिहास रहा है हमारे खुद की ज़मीन के कण कण के लिए। हम रक्त के क्षण क्षण […]

July 8, 2020

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भारत-चीन विवाद – An Article by Nikhil Singh

सौ करोड़ से अधिक लोगों को गोद में लिए, मस्तक पर धवल किरीट धारण किए हुए, सागर में पांव पसारे हुए, सोन चिरैया सा लहराता हुआ हिमालय की गोद में लिटा हुआ हमारा ये अखंड भारत। सदियों का इतिहास रहा है हमारे खुद की ज़मीन के कण कण के लिए। हम रक्त के क्षण क्षण से उसकी रक्षा करते आए है।

ये बुद्ध का भी देश है, ये युद्ध का भी देश है।
ये कृष्ण की वसुन्धरा, अर्जुन का कुरुक्षेत्र है।

पचपन सौ साल पुरानी सभ्यता हमें वासुदेव कुटुम्बकम की शिक्षा देती है।
पड़ोसी सबसे पहला परिवार होता है ऐसा इस देश का मानना है। और पाकिस्तान , चीन जैसे देशों से घिरे रहने के बावजूद, हम आज भी धैर्य और संयम से डटे हुए हैं।
चीन को ये भूलना नहीं चाहिए कि ये १९६२ का भारत नहीं , २०२० का नया भारत है।
वैशविक महामारी के इस दौर में जब सम्पूर्ण विश्व को साथ मिलकर मानवता के कल्याण की ओर प्रगतिशील होना चाहिए, उस समय दुनिया के दो सबसे से शशक्त सैन्य क्षमता वाले देश, युद्ध की कगार पर खड़े है। गलवान घाटी के पास चीन ने अपने सैन्य बल बढ़ा दिया है। जवाब में हिंदुस्तान की तीनों सेना तैयार है, Sukoi और Mig-30 जैसे विमान युद्ध स्तर पर तैयार है और केंद्र सरकार भी ये निश्चित कर चुकी है कि चीन से पीछे नही हटना है, और वो यह बात सुनिश्चित कर के रहेगी। हाल ही में बैन हुए 59 चीनी कंपनियों के मोबाइल एप्प ने ये बता दिया कि ये महाराणा प्रताप की धरती है जिन्होंने जरूरत पड़ने पर घास की रोटी खाई थी।

अंत में इस लेख के माध्यम से मैं चीन को यही संदेश देना चाहूँगा ।

कुछ बात है जो हस्ती मिटती नही हमारी
कुछ खास है जो हिन्द से सिंध तक हम है
यूनान मिसर रोमा मिट गए जहान से
अब भी हवाओं में है हिंदुस्तान हमारा
हिमाचल भी हम, विंध्याचल भी हम
अदिग, आँचल, अटल भी हम
पंच नदी पंजाब भी हम, वीर शिवाजी, चौहान भी हम
गंगा का विरल रूप भी देख, महानदी की महा प्रलय भी देख
भ्रमापुत्र कि नरमी देख, आ, आ, कोसी की गरमी देख
हम ही गाँधी, हम ही शुभाष,हम ही रण में भगत आज़ाद।

— निखिल सिंह



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